कहने को तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ हूँ मैं, फिर भी खतरों से डर रहा हूँ मैं।

पूरा अवश्य पढ़ें।

पत्रकारिता में एक व्यक्ति विशेष के अलावा यदि आप वास्तविक मुद्दों और समस्याओं को जनता के समक्ष लेकर आते हो तो आप देशद्रोही, पाकिस्तानी मुल्ले और सनातन धर्म के दोषी हो?? अजीब विडंबना है यहाँ पर के यदि आप स्वतंत्र काम कररहे हो तो आपको ही हाशिये पर लाके खड़ा कर दिया जाता है के या तो आप सत्ताधारियों के गुणगान कहो या फिर पाकिस्तान चले जाओ वरना गोली मार दी जायेगी।

बात गंभीर है और चिंता का विषय है, अभी कुछ समय पहले ही कुछ न्यायधीशों के द्वारा एक “प्रेस वार्ता” में लोकतंत्र और संविधान के खतरे में होने की बात को साझा किया गया था। साधारणतया “मीडिया और प्रेस” को ही आधार माना जाता है किसी भी घटना के विश्लेषण के लिए। पत्रकार अपने अधिकारों के अभाव में भी विश्वसनीय सूत्र माने जाते हैं किसी भी घटना या सूचना के तठस्थ होने के लिए। फिर चाहे वह किसी सरकार की आधिकारिक घोषणा हो, उनकी योजनाओं का विज्ञापन हो या फिर अधिसूचना जारी करनी हो। देश के प्रथम व्यक्ति से लेकर एक सामान्य नागरिक तक की आस्था पत्रकारिता पर केंद्रित है। अब जब कुछ पत्रकार किसी संगठन विशेष या फिर कहिये किसी निगम के अधीन या उनके तलवे चाटने के विपरीत जिन मुद्दों को जनता के सामने लाना चाहिए और जिन समस्याओं का समाधान के लिए सवाल करने चाहिए जैसे स्वतंत्र होकर काम कररहे हैं तो कुछ अराजक तत्व उन्हें ही निशाना बनाकर उनको और उनको परिवार वालों को जान से मारने की धमकी दे रहे हैं।

जी हां मैं बात कररही हूँ एक टेलीविज़न पत्रकार जैसे पत्रकारों की जो वास्तविक पत्रकारिता कररहे हैं और जिनके द्वारा असल मुद्दों पर चर्चा हो रही है उन्हें देशद्रोही पाकिस्तानी मुल्ला आदि कहकर धमकियाँ दी जा रही हैं।

ऐसा ये पहली बार नहीं हुआ है इससे पहले भी गौरी लंकेश जैसी महिला पत्रकार को उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सदुपयोग करने पर उसके जीवन पर अंकुश लगा दिया गया था उसको अभी कोई भुला ही नहीं था के Rana Ayyub बरखा दत्त जैसी फीमेल फ्रीलान्स जर्नलिस्ट को भी सोशल मीडिया पर धमकियां दी गयी और बेहद नीचता से ट्रोल किया गया और अब निशाना बना है एक और टेलीविजन पत्रकार।
अफ़सोस के साथ साथ मुझे आश्चर्य भी होता है लोगों की निकृष्ट मानसिकता पर जो संविधान के विपरीत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ही समाप्त कर देना चाहते हैं। आखिर और कितना नीचे गिरेगा ये समाज जो सच को सच न मान कर केवल बाहरी आडंबारों पर विश्वास किये हुए है।

आज इस घटना क्रम को सुनकर मैं खुद यही कह रही हूँ कि कहाँ गयी अनुच्छेद 19 (अ) जिसमें प्रेस स्वतंत्रता भी शामिल है, में वर्णित वाक् स्वतंत्रता जिसमें शांतिपूर्ण तरीके से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर आम नागरिक को दी गयी है। कहाँ गया वो संविधान जो वाक़ई समाजवादी, पंथनिरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य की कल्पना लिए विद्यमान, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक, न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास और धर्म की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समता के अधिकार से सुसज्जित हुआ करता था आज वो संविधान वाक़ई खतरे में है।

इक़रा असद
“Icks…”
छात्रा: पत्रकारिता एवं जनसंचार। आगरा।

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बलात्कार की सज़ा के कानून में संशोधन

विनम्र निवेदन,
जिस तरह भारतीय संविधान कई देशों के कानून से प्रेरित या गोद लिया हुआ है और इसमें संशोधन की गुंजाईश भी है तो मेरा सुझाव माननीय विधायिका से यह है कि बलात्कारियों के लिए जो सजा का प्रावधान है उसमें संशोधन करते हुए सऊदी अरब के कानून को लागू करना ज़रूरी है। तफ्तीश होने के बाद बलात्कारी को “सरेआम” गोली से मार देना ही जायज़ है। इससे किसी की भी भावनाएं आहत नहीं होंगी जब ऐसी मिसाली सज़ा मिलेगी बलात्कारियों को तब इससे सजा का खौफ बनेगा और परिणामस्वरूप ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगना भी संभव हो सकेगा। “हालात बदलने के लिए कानून में बदलाव अति आवश्यक है।”

इक़रा असद

“Icks…”

आगरा

महिला वो भी पत्रकार।

जी जनाब, अपने तो कह दिया के पत्रकारिता में लड़कियों के लिए सुरक्षित जगह नहीं हैं।

इसका मतलब यहाँ भी आप जैसे महान पुरुषों की बदौलत लडकियां असुरक्षित महसूस करती होंगी, जिन्हें ऐसी बातें करके डरा दिया जाता है और उनके हौसलों को पस्त करने की पुरजोर कोशिश की जाती है।

और जब आपने कहा कि अच्छी लड़कियां पत्रकारिता नहीं करती हैं, तो सहसा ही मुझे बहुत गुस्सा तो आया साथ ही हंसी और तरस भी आया आपकी संकीर्ण सोंच पर।

आप जैसे कुछ नीच लोगों की नियत ही इतनीं गंदी है और बदनाम उस पेशे को कररहे हैं जिसमें बरखा दत्त, शेरीन भान, निधि राज़दान, निधि कुलपति, श्वेता सिंह, अंजना ओम कश्यप, मृणाल पांडेय, राधिका रॉय, राना अय्यूब, अरफा खानम शेरवानी, नगमा खान, मेघना पन्त और न जाने कितनी महिला पत्रकारों ने अपना एक अलैहदा वजूद क़ायम किया हैं पत्रकारिता के क्षेत्र में।

मुलाहिज़ा फरमाएं जनाब आप इस क़दर गैर महफ़ूज़ या कहिये असुरक्षित या insecure क़्युं महसूस कररहे हैं महिला पत्रकारों से। क्या वजह है कि आप महिलाओं को आगे नहीं बढ़ने देना चाह रहे हैं। ध्यान रखिएगा आज मेरा दिल दुखा तो मैं लिख रही हूँ अगर आपने अपनी सोंच न बदली और ज़बान बन्द ना की तो कल को कोई आपके पीछे कुत्ते न छोड़ दे।
“Icks…”

बदलाव की शुरुआत… महिला दिवस विशेष।

महिला दिवस के मौके पर हर साल बात होती है महिलाओं को सशक्त बनाने की, उनके अधिकारों की, उनके ताकत की। उसके लिए सिर्फ एक दिन ही क्यों, हम महिलाओं को समझना होगा कि साल के सभी दिन उनके हैं। इन दिनों को जीने के लिए सिर्फ बाहर से ही नहीं, बल्कि अंदर से भी उन्हें ताक़तवर बनना होगा।
मगर कैसे? तो इसका उत्तर है कि *सबको करनी होगी कोशिश।* परस्पर सहयोग से ही महिला दिवस का सार्थक होना संभव है। महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए सिर्फ एक दिन कोशिश करने से बात नहीं बनेगी। शिक्षा, आर्थिक निर्भरता जैसे अस्त्र शस्त्र को पैना करने के लिए साल के 365 दिन काफी हैं यदि सदुपयोग किया जाये तो।
बेटियों को हर तरह से मज़बूत करने की ज़िम्मेदारी सिर्फ मन की ही नहीं, इसमें पिता की भूमिका भी सर्वोपरि है। घर और समाज के पुरुष जब तक यह महसूस नहीं करेंगे उनकी बेटी को उन्हें बाहर से ही नहीं, अंदर से भी मज़बूत और सुंदर बनाना है। तब जाके ये महिला दिवस वास्तविक रूप से मानाने योग्य होगा।
अर्थात एक महिला होने के नाते आसपास की हज़ारों चीज़ें हमें हर रोज़ परेशान करती हैं दूसरों को दोष देने की जगह निडर होकर हमें ही बदलाव की शुरुआत करनी होगी। मेरी बात से गर सहमत हैं तो कमेंट में ज़रूर अपनी प्रतिक्रिया ज़ाहिर करें। मेरी इस पोस्ट पर आप सभी के सुझावों का स्वागत है।
#HappyWomensDay
Regards; इक़रा असद

“Icks…”

बाल यौन शोषण: एक अभिशाप

चीख़ती आत्मा, सिसकती आहें।

दर्द भरी बातें और आंसूं भरी ऑंखें।

बात है बीते कुछ दिनों की जब लगातार कई घटनाएं ऐसी सुनने को मिलीं जिसे सुनकर हर किसी का दिल दहल गया था। न केवल भारत बल्कि पडोसी मुल्क पाकिस्तान में भी ज़ैनब जैसी कई मासूम ज़िन्दगियाँ ख़त्म कर दीं हैवानों ने अपनी हवस की ख़ातिर। यहाँ बात सिर्फ ज़ैनब या गुड़िया जैसी बच्चियों की ही नहीं बल्कि प्रद्युम्न और अब्दुल्लाह (आगरा) जैसे छोटे लड़कों के साथ हुई हैवानियत की भी हो रही है। जिनके साथ दरिंदों ने अपनी हवस मिटाकर उन्हें मार डाला और उनके माता- पिता को उम्र भर का गम और सदमा दे दिया।

ऐसी घटनाएं हमें अंदर से खकझोर के रख देती हैं और मजबूर करदेती हैं ये सोंचने पर की क्या इंसान की मानसिकता इस क़दर निकृष्ट हो चुकी है की एक मासूमियत भरा, भोलापन और प्यारा सा चेहरा उस हैवान के आगे हार जाता है।

यदि एक वयस्क महिला का सौंदर्य या रूप किसी पुरुष को आकर्षित करता है तो यह स्वाभाविक है परन्तु एक बच्चा जो केवल खेल- खिलौने और नटखट बातों से ही दिल जीतने का हुनर रखता है उनके साथ कोई शख्स इतनी हैवानियत कैसे कर सकता है? क्या मिला होगा उन दरिंदों को उन मासूमों के कोमल शरीर के साथ बर्बरता बरत कर।

क्या ऐसा करने वाले दिमागी बीमार होते हैं? क्या बाल यौन शोषण करने वालों की आत्मा नहीं होती या उन्हें डर नहीं होता की आज जो वह काम कर रहे हैं कल को उनके भी औलाद होगी। क्या उन बच्चों की चीखें उनके कानों में नहीं गूंजती होगी? क्या वो दरिंदे चैन से सो जाते होंगे? मेरे ख्याल से तो उन्हें ईश्वर भी न बुलाना चाहेगा अपने पास क्योंकि मौत भी इनसे डर जाती होगी।

उन बच्चों के घर वालों और माता – पिता के सर पर हाथ रखने वालों से कहूँगी कि अपना हाथ उनके सर पे रखने के बजाय उन वहशियों की गर्दन पर रख के दबा दो ताकि एक बुराई तो कम हो इस दुनिया से उनको तो पश्चाताप का मौका भी नहीं देना चाहिए। मेरा सवाल यह है कि ऐसे लोगों को उनके किये की सजा देने पर्याप्त होगा। इस बीमार मानसिकता वालों का हिसाब तो ऊपर वाला ही करेगा। लेकिन ऐसी घटनाएं एक ऐसा सवाल खड़ा कर जाती हैं जिसका जवाब कोई नहीं दे सकता।

इक़रा असद

छात्रा: पत्रकारिता विभाग,

डॉ भीमराव आंबेडकर विश्विद्यालय।

आगरा।

क्या शादी ज़रूरी है?

लडकियों के सपने शादी को लेकर इतने अंधे होते हैं कि वो सच्चाई से परे अपनी अलग दुनियाँ बसा लेती हैं , जहाँ सब कुछ उनके मन का होता है …. शायद यही वजह है कि एक उम्र के बाद लड़की, “शादी” को ही अपना सबसे बड़ा सपना मान लेती है और जब उसका ये सपना पूरा नहीं होता तो उसके लिए दुनियाँ ही खत्म हो जाती है …तो मैं आपको उस लड़की के बारे में बता रही थी जो नींद ना आने की मरीज हैं … ऐसा नहीं है उसे नींद नहीं आती थी …मुझे याद है वो क्लास में बैठे – बैठे सो जाती थी … और अब वो दवाई खाकर भी नहीं सो पाती …दवाइयों ने उसे इतना चिड़चिड़ा बना दिया है कि उसे लगता है कि वो बोझ है उन माँ बाप के ऊपर जो पिछले 27 सालों से उसे पाल रहे थे … अब उसे उसके अब्बू भी पसंद नहीं आते क्योंकि वो भी इस उम्मीद में ज़िंदा हैं कि कब वो दुल्हन बनेगी …ये वही अब्बू हैं, जो उसे बचपन में सफ़ेद घोड़े वाले राजकुमार की कहानी सुनाकर कहते थे” तेरे लिए भी ऐसा ही राजकुमार आएगा “अब उसे सब कुछ खटकता है … शायद कभी कभी अपना सजना संवरना भी …क्योंकि वो सोचती है शादी ही वो जादू की छड़ी है जिसके फेरते ही वो पहली जैसी हो जायेगी …अरे पागल, जादू की छड़ी तो बस उन नानी और दादी की कहानियों में होती थीं जो राजकुमारी की हर फरमाइश को पूरा कर देती …तुम या मैं कोई राजकुमारी नहीं हैं हम तो वो कठपुतलियाँ हैं जो समाज के बनाये नियमों पर चलती हैं …पर इन नियमों पर हमेशा चलना भी जरुरी नहीं होता …तुम इन्हें तोड़ भी सकती हो … खासकर उन नियमों को जिसने तुम्हे बीमार बना दिया है …

पढ़ी लिखी सुन्दर सी उस लड़की ने मार लिया है खुद को …उसने ही क्यों !! वो हर लड़की मार ही लेती है अपने हर सपने को ,अपनी ख्वाहिश को ,अपने अंदर छुपे प्यार को ,अपनी हंसी को , जिसकी किसी ना किसी कारण से शादी नहीं हो पाती …मैं ये नहीं कहती कि ये सपनों वाली दुनियाँ झूठी होती है …कुछ भी मन का नहीं होता … ऐसा नहीं है … यक़ीनन किसी का साथ होने से बड़ा कोई दूसरा सुख नहीं …पर … ये साथ कितने समझौते लाता है ये तुम्हे उस दुनियाँ में आने के बाद पता लगेगा …
मैं उसे क्या कहकर समझाऊं कि शादी दुखो का अंत नहीं होता , शादी तुम्हारे सपनों की मंजिल नहीं थी…शादी के बाद तुम्हें कुछ भी अतरिक्त नहीं मिलता …सिवाय उन खामियों के जो अब तक तुम्हारे परिवार ने उजागर नहीं की थी …
तुम एक अच्छी बेटी तो आसानी से बन गयी हो पर… इससे आगे वाली सीढ़ी पर खड़ा रहने के लिए तुम्हें अपने अंदर से सपने निकालकर फेंकना होगा और वो तुम्हारें तमाम सपनें होंगें ..जिन्हें तुमने कागज़ के उन पन्नों में जोड़ा है जिसे तुम ” डिग्री ” कहती हो …
तो
अब चुन लो …
एक शादी ना होना क्या इतना बड़ा है !!!
जो तुम इस गम में बीमार हो गयी हो !! और अभी से ही तुमने अपने उन सपनों को फेंक दिया है… अभी तो ऊपरवाले ने तुम्हें उन सपनों के साथ जीने का वक़्त दिया है …तो जी लो …क्योंकि समय के साथ ये सपने खुद व् खुद दूर हो जायेंगे …और अक्सर इन सपनों के बारे में सोचकर तुम्हें नींद भी नहीं आएगी..
इक़रा असद “Icks…”
(पत्रकारिता विभाग)
आगरा कॉलेज आगरा