क्या शादी ज़रूरी है?

लडकियों के सपने शादी को लेकर इतने अंधे होते हैं कि वो सच्चाई से परे अपनी अलग दुनियाँ बसा लेती हैं , जहाँ सब कुछ उनके मन का होता है …. शायद यही वजह है कि एक उम्र के बाद लड़की, “शादी” को ही अपना सबसे बड़ा सपना मान लेती है और जब उसका ये सपना पूरा नहीं होता तो उसके लिए दुनियाँ ही खत्म हो जाती है …तो मैं आपको उस लड़की के बारे में बता रही थी जो नींद ना आने की मरीज हैं … ऐसा नहीं है उसे नींद नहीं आती थी …मुझे याद है वो क्लास में बैठे – बैठे सो जाती थी … और अब वो दवाई खाकर भी नहीं सो पाती …दवाइयों ने उसे इतना चिड़चिड़ा बना दिया है कि उसे लगता है कि वो बोझ है उन माँ बाप के ऊपर जो पिछले 27 सालों से उसे पाल रहे थे … अब उसे उसके अब्बू भी पसंद नहीं आते क्योंकि वो भी इस उम्मीद में ज़िंदा हैं कि कब वो दुल्हन बनेगी …ये वही अब्बू हैं, जो उसे बचपन में सफ़ेद घोड़े वाले राजकुमार की कहानी सुनाकर कहते थे” तेरे लिए भी ऐसा ही राजकुमार आएगा “अब उसे सब कुछ खटकता है … शायद कभी कभी अपना सजना संवरना भी …क्योंकि वो सोचती है शादी ही वो जादू की छड़ी है जिसके फेरते ही वो पहली जैसी हो जायेगी …अरे पागल, जादू की छड़ी तो बस उन नानी और दादी की कहानियों में होती थीं जो राजकुमारी की हर फरमाइश को पूरा कर देती …तुम या मैं कोई राजकुमारी नहीं हैं हम तो वो कठपुतलियाँ हैं जो समाज के बनाये नियमों पर चलती हैं …पर इन नियमों पर हमेशा चलना भी जरुरी नहीं होता …तुम इन्हें तोड़ भी सकती हो … खासकर उन नियमों को जिसने तुम्हे बीमार बना दिया है …

पढ़ी लिखी सुन्दर सी उस लड़की ने मार लिया है खुद को …उसने ही क्यों !! वो हर लड़की मार ही लेती है अपने हर सपने को ,अपनी ख्वाहिश को ,अपने अंदर छुपे प्यार को ,अपनी हंसी को , जिसकी किसी ना किसी कारण से शादी नहीं हो पाती …मैं ये नहीं कहती कि ये सपनों वाली दुनियाँ झूठी होती है …कुछ भी मन का नहीं होता … ऐसा नहीं है … यक़ीनन किसी का साथ होने से बड़ा कोई दूसरा सुख नहीं …पर … ये साथ कितने समझौते लाता है ये तुम्हे उस दुनियाँ में आने के बाद पता लगेगा …
मैं उसे क्या कहकर समझाऊं कि शादी दुखो का अंत नहीं होता , शादी तुम्हारे सपनों की मंजिल नहीं थी…शादी के बाद तुम्हें कुछ भी अतरिक्त नहीं मिलता …सिवाय उन खामियों के जो अब तक तुम्हारे परिवार ने उजागर नहीं की थी …
तुम एक अच्छी बेटी तो आसानी से बन गयी हो पर… इससे आगे वाली सीढ़ी पर खड़ा रहने के लिए तुम्हें अपने अंदर से सपने निकालकर फेंकना होगा और वो तुम्हारें तमाम सपनें होंगें ..जिन्हें तुमने कागज़ के उन पन्नों में जोड़ा है जिसे तुम ” डिग्री ” कहती हो …
तो
अब चुन लो …
एक शादी ना होना क्या इतना बड़ा है !!!
जो तुम इस गम में बीमार हो गयी हो !! और अभी से ही तुमने अपने उन सपनों को फेंक दिया है… अभी तो ऊपरवाले ने तुम्हें उन सपनों के साथ जीने का वक़्त दिया है …तो जी लो …क्योंकि समय के साथ ये सपने खुद व् खुद दूर हो जायेंगे …और अक्सर इन सपनों के बारे में सोचकर तुम्हें नींद भी नहीं आएगी..
इक़रा असद “Icks…”
(पत्रकारिता विभाग)
आगरा कॉलेज आगरा

 

 

नारी का उत्थान

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती।

मैं इक़रा असद आज बात कर रही हूँ उन लोगों की जो औरतों की इज़्ज़त करना अपनी तौहीन समझते हैं। क्यूंकि अपने मयार(level) से गिर कर बात करना आज कल फैशन बन गया है, मेरी यह बात सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तर पर सटीक बैठती है, लेकिन मैं बात कर रही हूँ ‘आलोचना’ की जो आजकल हर धर्म, हर जाति, हर समाज में देखने को मिल रही है।

“आलोचना” महिलाओं की!!  फिर चाहे वह कितनी ही बुद्धिजीवी महिला क़्युं न हो लेकिन इस पुरुष प्रधान समाज में  महिला केवल चार दीवारी में रहने वाला एक ऐसा प्राणी है जिसको समय रहते पुरुष केवल अपने उपभोग की वस्तु मात्र समझता है, समझे भी क़्युं न आखिर प्रकृति का नियम ही निचली मानसिकता रखने वालों पर  कुछ इस क़दर  हावी है के बस क्या कहिये।

पुरुष प्रधान  समाज में एक महिला की आलोचना उतना ही आसान है जिस तरह भूख लगने पर खाने का विचार ज़हन में आना जो बेहद स्वाभाविक है।

आलोचना जब अदब के दायरे से निकलकर आपत्तिजनक भाषा में होने लग जाये तो उससे कुछ हासिल नहीं हो सकता सिवाय बदगुमानी और तनाव के और फिर ये चिंता का विषय बनते देर नहीं लगता। हमारा समाज इस बात को बड़ी अचरज के साथ देखता है के चार दीवारी में रहने वाली महिला इल्म हासिल करके बाहरी मुआशरे में अपनी राय या अपना नजरिया बेबाक तरीके से कैसे रख सकती है!!…

ये मेरा स्वयं का अनुभव है कि लोग हमेशा खासतौर से उन महिलाओं से ख़ार खाते हैं जो सवाल पूछती हैं या किसी विषय पर टिप्पणी देती हैं। क्युंकी लोग दूसरों की सुनना नहीं चाहते बल्कि अपनी बात दूसरे के मुंह में ठूंस के उसे सुनने के लिए आतुर रहते है। लेकिन इसके विपरीत यदि वह ऐसा न करे तो उसके ऊपर चरित्रहीन होने का लांछन लगाना सबसे आसान हथकंडा है अपना पुरुषार्थ दर्शाने का।

अधिकतर देखा गया है कि महिला सशक्तिकरण पर जो पुरुष गला फाड़ते हैं कहीं न कहीं वही पुरुष अपनी मित्र मंडली में बैठ के कहकहे लगाते हुए माँ-बहन की गाली के उदघोष से अपनी हास्यास्पद बात शुरू करते होते हैं या क्रोध में अपनी मां-बहनों को भूल दूसरों की मां-बहनों को भरपूर गलियां दे रहे होते हैं। ऐसी दोहरी मानसिकता रखने वाले लोगों को एक औरत की सफलता गले नहीं उतरती जो बेहत अफ़सोस जनक और शर्म नाक है, मैं उन पुरुषों से कहना चाहूंगी कि नारी को अपने समान न देख पाने के कारण उनका सम्मान न करना नपुंसकता का परिचय है, और एक नपुंसक समाज के दृष्टिकोण को सुधारने के लिए उद्दंड, स्वच्छंद एवं वात्सल्य से भरपूर मैं हूँ आज की नारी और अगले जन्म भी मैं “इक़रा असद” ही बनना चाहूँगी।